Friday, 25 October 2024

विकल मेघ

विकल मेघ

इस असीम सागर में धारा
मेरी भी अब खो जाने दो
थक कर चूर हुई बह बह कर
तन मन सारा चुक जाने दो

तम को इस रजनी ने कैसे
घूँट घूँट दृग मूँद पिया है
भोर हुई तब तुहिन कणों ने
जीवन कैसा क्षणिक जिया है

अभी क्षितिज पर उल्काएँ जो
नक्षत्रों से टूट गिरी हैं
नभ के ऑंगन विकल मेघ में
चंचल चपला रोष भरी है

आलोक बिन्दु पी पी कर ही
उडगन अपने धाम चले
टूटी वंशी के पीड़ित स्वर
अपने तापों से कण्ठ जले

विधु का तन शीतल ज्वाला में
जलता तपता है नीरव में
रजनी भर तारक चूनर में
इतराती अपने वैभव में

करुणा का सिन्धु उबलता है
लख लख कर अपनी छाया ही
मन का मृगशावक दौड़ रहा
लिपटी अधरों पर माया ही

      रामनारायण सोनी
       २६.१०.२४

Thursday, 24 October 2024

प्यास अधरों पर धरूँगा



स्वाँस के मृदु तन्तु टूटे
भाव के सब बन्ध टूटे
रट रहा फिर भी पपीहा
स्वॉंति के अनुबन्ध खूटे
जुगनुओं से रोशनी की अर्चना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

पुष्प हैं निस्पन्द सारे
मौन क्यूँ हैं सब दिशाएँ
भीत मन के द्वार आ कर
कँप रही हैं क्यूँ शिराएँ
नेह के इस मेघ से जल-याचना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

सूखती सी वर्तिका ले
दीप क्या यह जल सकेगा
क्या सुलगती सीपियों में
आस का मोती पलेगा
हो मलय मधुवात मन में प्रार्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

हैं प्रबल लहरें उदधि की
और तरणी क्षीण सी है
रौंदती मन को व्यथाएँ
चेतना कुछ लीन सी है
प्राण की वंशी बजे यह कामना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा

रामनारायण सोनी
३.८.२४

नयन नीर से भरे भरे


ये नयन नीर से भरे भरे
करुणा की छाया शीश धरे
हैं अब तक ठगे ठगे ठिठके
तेरे पदचिन्हों पर टिके टिके

धोते निज का नित खारा पन
उस मग में चिर करते नर्तन
अब सहज नहीं है सह पाना
कोरों से अंजन बह जाना

प्रिय मिलन विरह के कूलों की
द्वन्द्वो में मूर्छित फूलों की
सौरभ पी भटका पवन कहीं
अणु अणु ने अपनी व्यथा कही

ना प्रिय प्रवास से लौट सका
चिर पीर स्वयं की धो न सका
तम की छलनाएँ छलती हैं
अन्तर की ज्वाल उगलती है

उस दूर क्षितिज की सीमा के
उस पार निठुर सी गरिमा के
प्रियतम का न्यारा नगर वहाँ
चिर सजल नयन की पीर यहाँ

इनके जलप्लावन धुँधलाते
कोरों पर आकर थक जाते
मृदुहास छद्म सा नयनों में
चिर आस प्रीत की अयनों में

ये नयन नीर से भरे भरे
कब तक पीड़ा के घूँट भरे
या तो तुम ही अब आ जाओ
या अपने संग लिवा जाओ

रामनारायण सोनी
१३.०९.२४

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