Friday, 25 October 2024
विकल मेघ
Thursday, 24 October 2024
प्यास अधरों पर धरूँगा
नयन नीर से भरे भरे
ये नयन नीर से भरे भरे
करुणा की छाया शीश धरे
हैं अब तक ठगे ठगे ठिठके
तेरे पदचिन्हों पर टिके टिके
धोते निज का नित खारा पन
उस मग में चिर करते नर्तन
अब सहज नहीं है सह पाना
कोरों से अंजन बह जाना
प्रिय मिलन विरह के कूलों की
द्वन्द्वो में मूर्छित फूलों की
सौरभ पी भटका पवन कहीं
अणु अणु ने अपनी व्यथा कही
ना प्रिय प्रवास से लौट सका
चिर पीर स्वयं की धो न सका
तम की छलनाएँ छलती हैं
अन्तर की ज्वाल उगलती है
उस दूर क्षितिज की सीमा के
उस पार निठुर सी गरिमा के
प्रियतम का न्यारा नगर वहाँ
चिर सजल नयन की पीर यहाँ
इनके जलप्लावन धुँधलाते
कोरों पर आकर थक जाते
मृदुहास छद्म सा नयनों में
चिर आस प्रीत की अयनों में
ये नयन नीर से भरे भरे
कब तक पीड़ा के घूँट भरे
या तो तुम ही अब आ जाओ
या अपने संग लिवा जाओ
रामनारायण सोनी
१३.०९.२४
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ये नयन नीर से भरे भरे करुणा की छाया शीश धरे हैं अब तक ठगे ठगे ठिठके तेरे पदचिन्हों पर टिके टिके धोते निज का नित खारा पन उस मग में चिर ...
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