Saturday, 21 December 2024

स्वप्न गीले


उम्र की दहलीज पर ठिठकी कथाएँ
स्वाँस के अधिभार सहती सी व्यथाएँ
प्रात के अरुणार के अंचल घुली सी
साँझ तक लिखती रही खुद व्यंजनाएँ
अश्रुओं के देश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले

मन्द्र रव उन दूर बजती थालियों का
तन प्रकम्पित है विसुध सी प्यालियों का
भीत मन की कुक्षियों में प्राण गुम्फित
स्वर विकल हर गुल्म का उन डालियों का
इस विरागी वेश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले

ओ गुजरते पल जरा कुछ देर ठहरो
इस सजल घन वीथि में कुछ और विहरो
शतदलों के पत्र पर मणिमाल शोभित
कंटकों की पगथली कुछ देर बिसरो
इस अपलक उन्मेष में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले

रामनारायण सोनी

२२.१२.२४








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