उम्र की दहलीज पर ठिठकी कथाएँ
स्वाँस के अधिभार सहती सी व्यथाएँ
प्रात के अरुणार के अंचल घुली सी
साँझ तक लिखती रही खुद व्यंजनाएँ
अश्रुओं के देश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले
मन्द्र रव उन दूर बजती थालियों का
तन प्रकम्पित है विसुध सी प्यालियों का
भीत मन की कुक्षियों में प्राण गुम्फित
स्वर विकल हर गुल्म का उन डालियों का
इस विरागी वेश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले
ओ गुजरते पल जरा कुछ देर ठहरो
इस सजल घन वीथि में कुछ और विहरो
शतदलों के पत्र पर मणिमाल शोभित
कंटकों की पगथली कुछ देर बिसरो
इस अपलक उन्मेष में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले
रामनारायण सोनी
२२.१२.२४
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