बन्धनों को तोड़ आओ
देह मेरी गेह वर्तुल मृत्तिका की
नेह बहता राह गीली वर्तिका की
एक चिनगी आग पी लूँ
आस में कुछ और जी लूँ
सब क्षितिज के बन्धनों को तोड़ आओ
.बन्धनों को तोड़ आओ
आँधियों के ताप से जलती दिशाएँ
प्राण आकुल और आकुल है शिराएँ
श्वाँस से अनुबन्ध कर लूँ
खुशबुओं से सन्धि कर लूँ
आवरण सब गर्विता के छोड़ आओ
बन्धनों को तोड़ आओ
क्यों अधूरी प्यास अधरों में पले
अब न कोई स्वप्न अन्तर में जले
स्वरलता में राग भर लूँ
इन मुट्ठियों में रंग धर लूँ
धार जीवन जीवनी की मोड़ आओ
बन्धनों को तोड़ आओ
रामनारायण सोनी
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