विकल मेघ
इस असीम सागर में धारा
मेरी भी अब खो जाने दो
थक कर चूर हुई बह बह कर
तन मन सारा चुक जाने दो
तम को इस रजनी ने कैसे
घूँट घूँट दृग मूँद पिया है
भोर हुई तब तुहिन कणों ने
जीवन कैसा क्षणिक जिया है
अभी क्षितिज पर उल्काएँ जो
नक्षत्रों से टूट गिरी हैं
नभ के ऑंगन विकल मेघ में
चंचल चपला रोष भरी है
आलोक बिन्दु पी पी कर ही
उडगन अपने धाम चले
टूटी वंशी के पीड़ित स्वर
अपने तापों से कण्ठ जले
विधु का तन शीतल ज्वाला में
जलता तपता है नीरव में
रजनी भर तारक चूनर में
इतराती अपने वैभव में
करुणा का सिन्धु उबलता है
लख लख कर अपनी छाया ही
मन का मृगशावक दौड़ रहा
लिपटी अधरों पर माया ही
रामनारायण सोनी
२६.१०.२४
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