Sunday, 22 February 2026

होली गीत के रूप में 

मना रही होली है

कुदरत भी फूलों संग 
मना रही होली है
सरसों के खेत पर 
बनती पीली रंगोली है
देहरी पर मस्ती में 
हँस रही, फागुन की टोली है
तितली के पंखों सा 
हुआ है, रेशम सा मन 
टेसू के फूल जैसे 
खिल उठा है हर बदन 
सरसों के खेत पर 
मँड रही रंगोली है

ख्वाहिश के मौसम को 
महुए के गीत मिले
चेहरों पर हँसी ख़ुशी 
और दोस्ती के रंग भले 
मजीरों संग गूँज रही 
लोक-गीतों की धुन नई 
रिश्तों को मिल रही 
डगर और डोर नई
सरसों के खेत पर 
मँड रही रंगोली है

अम्बर ने भेजे हैं 
संदेश बसंत के प्यारे 
धरती ने खुद ही है 
सब रंग-उमंग वारे 
धड़क रहा हर आँगन 
फूलों की खुशबू से
होली ने दस्तक दी
टेसू के चटकीले इन रंगों से
फसलों की पायल भी
रुनझुन कर बोल रही 
चाँद की परछाई देख 
ठगी सी, सरिता भी देख रही 
सरसों के खेत पर 
मँड रही रंगोली है

गुड़हल और गुलमोहर 
हँस कर है झूम रहे 
कोयल और बुलबुल भी
चहके से घूम रहे 
धरती के पन्नों पर 
रंग नए खेल सखी !
मौसम के सिर चढ़ता 
केसरिया रंग सखी !
तस्वीरें इस जीवन की 
तू रंगों से निखार ले 
भूल कर गिले शिकवे 
मीठे बोल से पुकार ले 
कुदरत भी रंगो और फूलों संग 
मना रही होली है

सरसों के खेत पर 
मँड रही रंगोली है
रंगों का मधुर मेल 
सिखा रही होली है

अमर खनूजा चड्ढा

Saturday, 28 December 2024

सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

मेरा क्षणभंगुर जीवन है
हैं नीचे सारे शूल बिछे
सजता सजनी के जूड़े में
साजन का सारा मान रिझे
   अपना उर खूब सजाता हूँ
   सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

आओ मधुपरियाँ तुम आओ
मुझमें मुदमय मकरन्द भरा
चतुर शिल्प की शिल्पी तुम
तुम में शिल्पों का ज्ञान भरा
     दे कर निजकोश लजाता हूँ
     सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

है नहीं दृष्टि में भेद मेरी
क्यों देवों का ही यजन करूँ
उत्सर्ग भरी उन राहों में
खुद ही अपना प्रतिदान धरूँ
      यह करते भी शरमाता हूँ
      सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

पंखुड़ियों में प्रभु ने मेरी
कूट कूट सौंदर्य भरा
जग को यह सारा बाँट सकूँ
हूँ इसीलिये तो भरा भरा
     मन में अभिमान न लाता हूँ
     सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

यह अम्बर खड़ा वितान लिये
यह धरा धरित्री है मेरी
पवन हिंडोला झलता है
यह डाल मयित्री है मेरी
       मैं पाकर इन्हें अघाता हूँ
       सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

चिरऋणी रहूँगा उपवन का
जो गेह हुआ, प्रतिपाल बना
मैं कृतज्ञ उस माली का 
जिसने जीवन का तार बुना
      यह सोच सोच इठलाता हूँ 
      सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

रामनारायण सोनी
२९.१२.२४


Wednesday, 25 December 2024

गीत ने मेरे पुकारा


गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा

स्वप्न जागे, रात सोई, 
याद ने माला पिरोई
घन-तिमिर में अश्रुओं ने 
आज रूखी आँख धोई
जो लिखी पल ने कहानी 
चितवनों ने आज खोई
रागिनी ने तार में खुद को सँवारा
गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा

प्राण में बस एक तुम ही 
श्वाँस औ' प्रश्वास तुम ही
चित्त के प्रस्तर तले भी
एक ही अहसास तुम ही
बिम्ब में प्रतिबिम्ब में भी
रूप का प्रतिभास तुम ही
लौट आया है वही मधुमास प्यारा
गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा

श्वाँस में निशिगंध भर लो
प्राण में उल्लास धर लो
पुष्प के शुभ आभरण की
वेणि से श्रृंगार कर लो
यामिनी ना बीत जाए
प्यार से गलबाँह भर लो

इस हृदय में नाम केवल है तुम्हारा
गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा

रामनारायण सोनी
२६.१२.२४

Tuesday, 24 December 2024

भोर की संकल्पना


भोर की संकल्पना

पंथ के प्रहरी विदेही हो चले
पाँखियों के पंख में उत्सव घुले
जागता अभिसार भू के रजकणों में
नवकुसुम के नयन पट हैं अधखुले
     प्रात की अंजन शलाका
     अरुण अंजन आँजती है

थी अलसती उस विजन की वीथियाँ
जो मुँदी पलकों तले थी सीपियाँ
जागती स्वर ले प्रभाती के मधुर
पनघटों पर आ जुड़ी पनहारियाँ
        नीरजा के अंक बैठी वंशिका
         ओस को पुचकारती है

सुमन सौरभ की सुरीली अल्पना
है विगत अब शूल की अतिरंजना
मदिर मन्थर सुप्त थे पवमान सारे
जाग उठ्ठी नवकिवरण की कल्पना
      नील नभ में नव पताका
       ने उतारी आरती है

रामनारायण सोनी
२५.१२.२४

Saturday, 21 December 2024

स्वप्न गीले


उम्र की दहलीज पर ठिठकी कथाएँ
स्वाँस के अधिभार सहती सी व्यथाएँ
प्रात के अरुणार के अंचल घुली सी
साँझ तक लिखती रही खुद व्यंजनाएँ
अश्रुओं के देश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले

मन्द्र रव उन दूर बजती थालियों का
तन प्रकम्पित है विसुध सी प्यालियों का
भीत मन की कुक्षियों में प्राण गुम्फित
स्वर विकल हर गुल्म का उन डालियों का
इस विरागी वेश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले

ओ गुजरते पल जरा कुछ देर ठहरो
इस सजल घन वीथि में कुछ और विहरो
शतदलों के पत्र पर मणिमाल शोभित
कंटकों की पगथली कुछ देर बिसरो
इस अपलक उन्मेष में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले

रामनारायण सोनी

२२.१२.२४








Monday, 2 December 2024

बन्धनों को तोड़ आओ

बन्धनों को तोड़ आओ

देह मेरी गेह वर्तुल मृत्तिका की 
नेह बहता राह गीली वर्तिका की
एक चिनगी आग पी लूँ
आस में कुछ और जी लूँ
सब क्षितिज के बन्धनों को तोड़ आओ
                  .बन्धनों को तोड़ आओ

आँधियों के ताप से जलती दिशाएँ 
प्राण आकुल और आकुल है शिराएँ
श्वाँस से अनुबन्ध कर लूँ
खुशबुओं से सन्धि कर लूँ
आवरण सब गर्विता के छोड़ आओ
                बन्धनों को तोड़ आओ

क्यों अधूरी प्यास अधरों में पले
अब न कोई स्वप्न अन्तर में जले
स्वरलता में राग भर लूँ
इन मुट्ठियों में रंग धर लूँ
धार जीवन जीवनी की मोड़ आओ
                बन्धनों को तोड़ आओ

रामनारायण सोनी

Friday, 25 October 2024

विकल मेघ

विकल मेघ

इस असीम सागर में धारा
मेरी भी अब खो जाने दो
थक कर चूर हुई बह बह कर
तन मन सारा चुक जाने दो

तम को इस रजनी ने कैसे
घूँट घूँट दृग मूँद पिया है
भोर हुई तब तुहिन कणों ने
जीवन कैसा क्षणिक जिया है

अभी क्षितिज पर उल्काएँ जो
नक्षत्रों से टूट गिरी हैं
नभ के ऑंगन विकल मेघ में
चंचल चपला रोष भरी है

आलोक बिन्दु पी पी कर ही
उडगन अपने धाम चले
टूटी वंशी के पीड़ित स्वर
अपने तापों से कण्ठ जले

विधु का तन शीतल ज्वाला में
जलता तपता है नीरव में
रजनी भर तारक चूनर में
इतराती अपने वैभव में

करुणा का सिन्धु उबलता है
लख लख कर अपनी छाया ही
मन का मृगशावक दौड़ रहा
लिपटी अधरों पर माया ही

      रामनारायण सोनी
       २६.१०.२४

होली गीत के रूप में  मना रही होली है कुदरत भी फूलों संग  मना रही होली है सरसों के खेत पर  बनती पीली रंगोली है देहरी पर मस्ती में  हँस रही, फ...