सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
मेरा क्षणभंगुर जीवन है
हैं नीचे सारे शूल बिछे
सजता सजनी के जूड़े में
साजन का सारा मान रिझे
अपना उर खूब सजाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
आओ मधुपरियाँ तुम आओ
मुझमें मुदमय मकरन्द भरा
चतुर शिल्प की शिल्पी तुम
तुम में शिल्पों का ज्ञान भरा
दे कर निजकोश लजाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
है नहीं दृष्टि में भेद मेरी
क्यों देवों का ही यजन करूँ
उत्सर्ग भरी उन राहों में
खुद ही अपना प्रतिदान धरूँ
यह करते भी शरमाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
पंखुड़ियों में प्रभु ने मेरी
कूट कूट सौंदर्य भरा
जग को यह सारा बाँट सकूँ
हूँ इसीलिये तो भरा भरा
मन में अभिमान न लाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
यह अम्बर खड़ा वितान लिये
यह धरा धरित्री है मेरी
पवन हिंडोला झलता है
यह डाल मयित्री है मेरी
मैं पाकर इन्हें अघाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
चिरऋणी रहूँगा उपवन का
जो गेह हुआ, प्रतिपाल बना
मैं कृतज्ञ उस माली का
जिसने जीवन का तार बुना
यह सोच सोच इठलाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
रामनारायण सोनी
२९.१२.२४
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