Saturday, 28 December 2024

सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

मेरा क्षणभंगुर जीवन है
हैं नीचे सारे शूल बिछे
सजता सजनी के जूड़े में
साजन का सारा मान रिझे
   अपना उर खूब सजाता हूँ
   सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

आओ मधुपरियाँ तुम आओ
मुझमें मुदमय मकरन्द भरा
चतुर शिल्प की शिल्पी तुम
तुम में शिल्पों का ज्ञान भरा
     दे कर निजकोश लजाता हूँ
     सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

है नहीं दृष्टि में भेद मेरी
क्यों देवों का ही यजन करूँ
उत्सर्ग भरी उन राहों में
खुद ही अपना प्रतिदान धरूँ
      यह करते भी शरमाता हूँ
      सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

पंखुड़ियों में प्रभु ने मेरी
कूट कूट सौंदर्य भरा
जग को यह सारा बाँट सकूँ
हूँ इसीलिये तो भरा भरा
     मन में अभिमान न लाता हूँ
     सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

यह अम्बर खड़ा वितान लिये
यह धरा धरित्री है मेरी
पवन हिंडोला झलता है
यह डाल मयित्री है मेरी
       मैं पाकर इन्हें अघाता हूँ
       सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

चिरऋणी रहूँगा उपवन का
जो गेह हुआ, प्रतिपाल बना
मैं कृतज्ञ उस माली का 
जिसने जीवन का तार बुना
      यह सोच सोच इठलाता हूँ 
      सौरभ सब ओर लुटाता हूँ

रामनारायण सोनी
२९.१२.२४


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