भोर की संकल्पना
पंथ के प्रहरी विदेही हो चले
पाँखियों के पंख में उत्सव घुले
जागता अभिसार भू के रजकणों में
नवकुसुम के नयन पट हैं अधखुले
प्रात की अंजन शलाका
अरुण अंजन आँजती है
थी अलसती उस विजन की वीथियाँ
जो मुँदी पलकों तले थी सीपियाँ
जागती स्वर ले प्रभाती के मधुर
पनघटों पर आ जुड़ी पनहारियाँ
नीरजा के अंक बैठी वंशिका
ओस को पुचकारती है
सुमन सौरभ की सुरीली अल्पना
है विगत अब शूल की अतिरंजना
मदिर मन्थर सुप्त थे पवमान सारे
जाग उठ्ठी नवकिवरण की कल्पना
नील नभ में नव पताका
ने उतारी आरती है
रामनारायण सोनी
२५.१२.२४
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