Tuesday, 24 December 2024

भोर की संकल्पना


भोर की संकल्पना

पंथ के प्रहरी विदेही हो चले
पाँखियों के पंख में उत्सव घुले
जागता अभिसार भू के रजकणों में
नवकुसुम के नयन पट हैं अधखुले
     प्रात की अंजन शलाका
     अरुण अंजन आँजती है

थी अलसती उस विजन की वीथियाँ
जो मुँदी पलकों तले थी सीपियाँ
जागती स्वर ले प्रभाती के मधुर
पनघटों पर आ जुड़ी पनहारियाँ
        नीरजा के अंक बैठी वंशिका
         ओस को पुचकारती है

सुमन सौरभ की सुरीली अल्पना
है विगत अब शूल की अतिरंजना
मदिर मन्थर सुप्त थे पवमान सारे
जाग उठ्ठी नवकिवरण की कल्पना
      नील नभ में नव पताका
       ने उतारी आरती है

रामनारायण सोनी
२५.१२.२४

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